अफगान नीति में बदलाव करे भारत India to change Afghan policy

अफगान नीति में बदलाव करे भारत
India to change Afghan policy


India to change Afghan policy


इस लेख में यह समझने की जरूरत है की किस तरह से पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान अमेरिका के साथ मिलकर यह जताने की कोशिश कर रहे है की हमारा देश आतंकी है, पर वह सीधे इस बात को डोनाल्ड ट्रंप के सामने नहीं रह रहे है किसी निजी रिश्तो का सहारा लिया और अपनी बात कही बाकि आप इस लेख को पढ़ कर समझ सकते है ।

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान कतर एयरलाइंस की व्यावसायिक उड़ान से जब अमेरिका पहुंचे तो उनकी आगवानी के लिए कोई अमेरिकी मंत्री मौजूद नहीं था । उनके वित्त मंत्री शाह महमूद कुरैशी और पाकिस्तानी राजदूत के अलावा पाकिस्तान मूल के कुछ अमेरिकियों ने ही उनका स्वागत किया । वहां केवल एक अमेरिकी महिला प्रोटोकॉल अधिकारी ही उपस्थित थीं । उन्हें तब और असहज होना पड़ा जब पाकिस्तान के बलूच, सिंधी और मोहाजिर तबके के लोगों ने उनके सामने विरोध-प्रदर्शन किया । इमरान खान के साथ पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जावेद बाजवा के अलावा ताकतवर खुफिया एजेंसी आइएसआइ के मुखिया लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद भी गए । ये सभी हवाई अड्डे से मेट्रो रेल के जरिये पाकिस्तानी दूतावास पहुंचे । ये सभी दूतावास में ही रहे । उनके द्वारा बरती गई इस किफायत की कंगाल और बदहाल होते देश में लोगों द्वारा भारी सराहना की गई । ऐसा पहली बार हुआ जब किसी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के साथ सेना के दो शीर्ष जनरल भी साथ गए । असल में इमरान अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान से संपर्क साधना चाहते थे और दोनों जनरल अमेरिकी सेना के साथ मिलकर अफगानिस्तान में काम कर चुके थे । पाकिस्तानी जनरल अमेरिका के शीर्ष सैन्य कमांडरों को यह समझाने में सफल रहे कि अपनी धरती पर आतंक के खिलाफ मुहिम में पाकिस्तान खासा गंभीर है । दूसरी वजह यह रही कि व्हाइट हाउस में अपने सैन्य नेतृत्व की परेड कराकर इमरान खान ने अमेरिकी राष्ट्रपति को इस बात के लिए आश्वस्त करने की कोशिश की कि जो भी वादे किए जाएंगे उन्हें पूरा किया जाएगा, क्योंकि ये पाकिस्तान के वास्तविक शासकों यानी सैन्य कमांडरों के सामने हो रहे हैं ।


डोनाल्ड ट्रंप-इमरान खान वार्ता की कड़ी सऊदी अरब के युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने जोड़ी थी जिन्होंने इसके लिए ट्रंप के दामाद के साथ अपने निजी रिश्तों का सहारा लिया । इसकी कोशिशें दिसंबर, 2018 से ही शुरू हो गई थीं जब ट्रंप ने इमरान खान को पत्र लिखकर अफगान शांति प्रक्रिया में उनसे मदद मांगी थी । इमरान खान भी ट्रंप से मिलने को आतुर थे ताकि पाकिस्तान को लेकर उनकी नकारात्मक धारणा दूर कर सकें । इस्लामाबाद ने इसके लिए हालैंड एंड नाइट जैसी लाबिंग फर्म की सेवाएं ली थीं । कुछ अरसा पहले ट्रंप ने ट्विटर पर कहा था कि बीते 15 वर्षो में पाकिस्तान ने 33 अरब डॉलर की मदद के बदले में झूठ और फरेब के बदले कुछ और नहीं दिया । वही ट्रंप अब पाक के साथ संबंधों में सुधार के मकसद से इमरान खान का स्वागत करते दिखे । ट्रंप को उम्मीद है कि इमरान खान तालिबान से समझौता कराने में मददगार होंगे ताकि नवंबर, 2020 को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले अमेरिकी सैनिक स्वदेश लौट आएं । इमरान खान से मुलाकात के दौरान ट्रंप ने अपने चिरपरिचित अंदाज में शिगूफा छेड़ा कि पीएम मोदी ने उनसे कश्मीर में मध्यस्थता का अनुरोध किया है । इससे इमरान के मुङरए चेहरे पर भी मुस्कान तैरना स्वाभाविक था ।


अमेरिका ने इमरान खान से किसी सैन्य या आर्थिक सहायता का वादा नहीं किया है । इस दौरान पाकिस्तान को केवल 16.5 करोड़ डॉलर की राशि मिली वह भी उन एफ-16 विमानों की मरम्मत और रखरखाव के लिए जो उसे अमेरिका से मिलेंगे । इसमें भी एक शर्त यह है कि उन्हें भारत के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता । हालांकि इमरान खान के अमेरिका दौरे के कुछ खास निहितार्थ भी रहे । एक तो यही कि अमेरिका-पाक रिश्ते वापस सुधार की ओर अग्रसर हुए हैं । दूसरा यही कि भारत अभी भी अमेरिका के लिए अहम बना रहेगा, लेकिन वाशिंगटन इस्लामाबाद से भी संतुलन साधेगा जैसा कि वह पहले करता था । तीसरा यह कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के मामले में पाकिस्तान आधार बिंदु बन गया है । ऐसा इस्लामाबाद की संदिग्ध नीति के कारण हुआ है जहां वह तालिबान की मदद करता तो दूसरी ओर उससे लड़ने के नाम पर अमेरिका से डॉलर वसूलता रहा । यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि पाक की तालिबान पर पूरी पकड़ है । कश्मीर पर ट्रंप की शिगूफेबाजी इमरान के दौरे की सबसे बड़ी थाती रही, लेकिन इससे पाकिस्तान को कुछ हासिल नहीं होने वाला । कश्मीर के मसले पर अमेरिकी मध्यस्थता की संभावनाओं पर पाकिस्तानी मीडिया गदगद हो गया । ट्रंप के बयान पर भारत में विपक्ष प्रधानमंत्री मोदी से निजी स्पष्टीकरण की मांग पर अड़ा, लेकिन मोदी ने बड़बोले अमेरिकी राष्ट्रपति को शर्मसार करना उचित नहीं समझा । इसे अमेरिका ने भी समझा होगा ।


अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ अपनी पहली बैठक में इमरान खान ने द्विपक्षीय रिश्तों में आए खालीपन को भरने के साथ ही अविश्वास की खाई को पाटने का काम किया । इमरान का अमेरिका दौरा इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह तब हुआ जब तालिबान के साथ अमेरिका की वार्ता निर्णायक दौर में पहुंच रही है । दोहा में तालिबान के साथ अगले दौर की वार्ता फिर से होने जा रही है । माना जा रहा है कि जल्द ही कोई समझौता हो सकता है ।

अमेरिका में इमरान खान ने स्वीकार किया कि पाकिस्तानी धरती पर करीब 40 आतंकी संगठनों के 40,000 आतंकवादी सक्रिय हैं जिन पर कार्रवाई करनी होगी । हालांकि इमरान खान के पूर्ववर्तियों ने भी ऐसे दावों के साथ पहले भी अमेरिका को गुमराह किया है और इस मामले में वक्त उनकी भी परीक्षा लेगा । इमरान खान ने अमेरिका में यह भी कहा कि वह तालिबान से मिलकर उसे अफगान सरकार से बातचीत के लिए मनाने की पूरी कोशिश करेंगे । इस पर तालिबान के प्रवक्ता ने भी कहा कि अगर पाकिस्तान आमंत्रित करता है तो हम वहां जरूर जाएंगे ।


भारत को भी अपनी अफगानिस्तान नीति में बदलाव करते हए तालिबान से बातचीत करनी चाहिए । कूटनीतिक तकाजा यही कहता है कि व्यावहारिकता को सिद्धांतों पर तरजीह दी जाए । तालिबान भले ही आतंकी हों, लेकिन वे हैं तो अफगानी ही । मौजूदा अफगान वार्ता में शामिल न होकर भारत ने इस्लामाबाद को बढ़त बनाने का अवसर दे दिया है । अफगान तालिबान के साथ हालिया वार्ता में अमेरिका, रूस और चीन के अलावा पाकिस्तान भी शामिल हुआ । अफगानिस्तान रणनीतिक रूप से भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है । इस युद्ध पीड़ित देश में हमने मानव और अन्य संसाधनों में भारी निवेश किया है । भारत को लेकर अफगानियों में सदियों से अच्छी भावनाएं रही हैं । इनमें तालिबान के कुछ धड़े भी शामिल हैं । प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति से भी ये भावनाएं बढ़ी हैं । काबुल में तालिबानी शासन इस्लामाबाद को भारत के खिलाफ सामरिक पैठ और कश्मीर में जारी आतंकी संघर्ष में फायदा पहुंचाएगा । तालिबान की दुश्मनी से ज्यादा उसकी दोस्ती दिल्ली के लिए कहीं ज्यादा फायदेमंद है ।


(लेखक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी हैं)


काबुल में संभावित तालिबानी शासन इस्लामाबाद को भारत के खिलाफ सामरिक पैठ बनाने में फायदा ही पहुंचाएगा
ब्रिगेडियर आरपी सिंह


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